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तिरुपति के प्रसिद्ध ‘लड्डू प्रसादम’ में कथित तौर पर घटिया घी और जानवरों की चर्बी (मछली का तेल, सूअर की चर्बी आदि) की मिलावट के आरोपों ने पूरे देश में धार्मिक और राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया था। इस विवाद के केंद्र में आंध्र प्रदेश की पूर्ववर्ती YSRCP सरकार और तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के पूर्व अध्यक्ष वाई. वी. सुब्बा रेड्डी थे।
विभिन्न मीडिया संस्थानों ने रिपोर्ट किया कि सुब्बा रेड्डी के कार्यकाल (जून 2019 – अगस्त 2023) के दौरान घी की खरीद में अनियमितताएं हुईं। इन रिपोर्टों को “मानहानिकारक” बताते हुए सुब्बा रेड्डी ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें
सुब्बा रेड्डी और उनकी पत्नी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दयान कृष्णन ने निम्नलिखित तर्क दिए:
अपूरणीय क्षति: मीडिया रिपोर्टों से याचिकाकर्ता की छवि और प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा है।
भ्रामक रिपोर्टिंग: रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि मिलावट याचिकाकर्ता के इशारे पर हुई, जबकि मामला अभी भी जांच के अधीन है।
सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही: चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इस मामले की जांच के लिए एक स्वतंत्र विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है, इसलिए मीडिया द्वारा समानांतर सुनवाई (Media Trial) अनुचित है।
दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय और टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति अमित बंसल ने याचिकाकर्ता को तुरंत ‘एकतरफा अंतरिम राहत’ (Ex-parte Interim Injunction) देने से इनकार कर दिया। कोर्ट के आदेश के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
प्रतिवादियों को सुनने का अधिकार: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना दूसरे पक्ष (मीडिया संस्थानों) को सुने प्रकाशन पर रोक लगाना सामान्य नियम नहीं है। ‘ऑडी अल्टरम पार्टम’ (दूसरे पक्ष को भी सुनें) का सिद्धांत यहाँ महत्वपूर्ण है।
असाधारण परिस्थितियाँ: न्यायालय ने कहा कि ‘एकतरफा अंतरिम रोक’ केवल अत्यंत असाधारण और दुर्लभ परिस्थितियों में ही दी जा सकती है, जो इस मामले में प्रथम दृष्टया नहीं दिखी।
मीडिया की स्वतंत्रता बनाम मानहानि: कोर्ट ने प्रेस की स्वतंत्रता और व्यक्ति की प्रतिष्ठा के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। न्यायाधीश ने मौखिक रूप से यह भी टिप्पणी की कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों को “मोटी चमड़ी” (Thick-skinned) का होना चाहिए।
न्यायालय का आदेश: “इस स्तर पर, न्यायालय प्रतिवादियों के खिलाफ उनके प्रकाशनों/लेखों पर एकतरफा अंतरिम रोक लगाने के पक्ष में नहीं है। प्रतिवादियों को अपना बचाव पेश करने का अवसर देना उचित होगा।”
भविष्य की चेतावनी (Cautionary Note)
भले ही कोर्ट ने पुरानी रिपोर्टों पर रोक नहीं लगाई, लेकिन उसने मीडिया संस्थानों को चेतावनी दी है कि 23 दिसंबर 2025 के बाद किए गए किसी भी नए प्रकाशन या पोस्ट की न्यायिक समीक्षा की जाएगी। यदि कोई सामग्री आपत्तिजनक पाई गई, तो संबंधित प्रकाशकों को कानूनी परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।
5. कानूनी शोध के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Key Legal Takeaways)
यह मामला कानून के छात्रों और पेशेवरों के लिए कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांतों को दोहराता है:
| सिद्धांत | विवरण |
|---|---|
| Ex-parte Injunction | आदेश 39 नियम 1 और 2 (CPC) के तहत, जो केवल ‘Irreparable Loss’ की स्थिति में दिया जाता है। |
| Bonnard v. Perryman Rule | मानहानि के मामलों में, यदि प्रतिवादी यह तर्क देता है कि वह सच बोल रहा है, तो आमतौर पर अंतरिम रोक नहीं दी जाती। |
| Article 19(1)(a) | प्रेस की स्वतंत्रता और सूचना का अधिकार, विशेषकर जब मामला सार्वजनिक महत्व का हो। |
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि जब मामला सार्वजनिक आस्था और बड़े विवाद से जुड़ा हो, तो न्यायालय मीडिया की आवाज को दबाने में जल्दबाजी नहीं दिखाएगा। अब सभी की निगाहें 29 जनवरी 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर हैं, जहाँ मीडिया संस्थान अपना लिखित जवाब दाखिल करेंगे।
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